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Tuesday, March 19, 2013

That’s out of the Ground



 In cricket quality batsmen were always treated with respect. All the batsmen can broadly be divided into two categories: one is attacking batsmen and another one is technical batsmen. As cricket is getting older players of technical categories became lesser now a days. ODI and now T-20 helped the attacking category to grow at faster rate. Especially T-20 worked like Borunvita to attacking category. Sanath Jayasuriya, Chris Gayle, Virendar Sehwag, Brendon Mccullum, Kieron Pollard, Tillakaratne Dilshan, Herschelle Gibbs, David Warner and Shahid Afridi are the kings of this category. All this players are the brand ambassadors of this category. Pitch condition, opponent and match condition doesn’t hassle them at all. Their first and last catchword is to hit the ball hard. From the above list of players there is a player for whom this catchword is his life. 

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Monday, January 7, 2013

मिस्टर क्रिकेटर :माइकल हसी


क्रिकेट के खेल मे फिनिशर की भुमिका हमेशा महत्व्पूर्ण रहती है.फिनिशर वो खिलाडी रहता है जो मिडिल आर्डर मे खेलता हो और जब टीम रनो का पिछा कर रही हो तो मैच को टीम की झोली मे डालकर ही मैदान से वापस आये.

भारत के लिये पहले ये भुमिका कभी कपिल देव,जडेजा और रोबिन सिह निभाते थे तो अब धोनी,युवराज और रैना ने ये जिम्मेदारी ले ली है.रोशन महानामा,कोलिंगवूड और बेवन इस जिम्मेदारी को निभाने मे सर्वश्रेष्ठ थे.

आस्ट्रेलिया के लिये माइकल बेवन ने कई सालो तक फिनिशर की भुमिका मे रहते हुये आस्ट्रेलिया को जीत दिलाई है.
उनके जाने के बाद कुछ सालो तक बीच बीच मे एक दो खिलाडी आये परंतु बेवन की कमी को पूरा नही कर पाये.

1 फरवरी 2004 को आस्ट्रेलिया को एक ऐसा खिलाडी मिला जिसने लगभग बेवन की कमी को पूरा कर दिया. वो बाये हाथ से खेलता है, बेवन की तरह शानदार फिल्डिंग करता है.बस बेवन की तरह गेंदबाजी नही कर पाता है.

मिस्टर क्रिकेटर के नाम से मशहूर माइकल हसी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मे 28 साल की उम्र मे अपना डेब्यू भारत के खिलाफ़ एकदिवसीय क्रिकेट से किया था.आस्ट्रेलियाई क्रिकेट मे बहुत कम खिलाडीयो को कम उम्र मे टीम मे खेलने को मिलता है. परंतु माइकल हसी को तो ये मौका काफी देर से मिला उन्होने 30 साल की उम्र मे वेस्टइंडीज़ के खिलाफ टेस्ट क्रिकेट मे डेब्यू किया था.

अपना पहला टेस्ट मैच खेलने से पहले माइकल हसी ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट मे वेस्टर्न आस्ट्रेलिया की तरफ से खेलते हुये 15331 रन बनाये थे. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मे इतनी देर से डेब्यू करने वाले माइकल हसी ने आते ही शानदार खेल दिखाया और अपने दुसरे ही टेस्ट मैच मे शानदार शतक लगा दिया.

नाक पर हमेशा सन्स क्रिम लगाकर खेलने वाले, शांत स्व्भाव के माइकल हसी जब एक बार पिच पर टीक जाते थे तो उन्हे आऊट करना बहुत मुश्किल होता था. स्व्भाव से शांत हसी के खेल मे काफी तेजी थी. अगर चौके और छ्क्के नही लगते थे तो वो तेजी से दौड कर कई सारे रन बटोर लेते थे.

माइकल हसी एक फिनिशर थे और नबंर 5 पर आकर आस्ट्रेलिया की पारी को सम्भाल भी लेते थे और गती भी देते थे. टेलेंडर्स के साथ किस तरह खेला जाता है ये उनसे हर किसी को सिखना चाहिये और इसकी मिसाल उन्होने कई बार दी है. साऊथ अफ्रिका के खिलाफ 2005 मे उन्होने अपनी जमीन पर ग्लैन मैक्ग्राथ के साथ 10वे विकेट के लिये 107 रनो की साझेदारी की थी.अगले साल 2006 मे उन्होने बांग्लादेश के साथ उन्ही की जमीन पर जैसन गिलेस्पी के साथ शानदार 320 रनो की साझेदारी की थी जिसमे माइकल हसी ने 182 रन बनाये थे जो उनके टेस्ट करियर का सर्वाधिक स्कोर है.

सबसे कम समय मे 1000 टेस्ट रन बनाने का रिकार्ड भी उनके ही नाम है उन्होने 18 अप्रैल 2006 को सिर्फ 166 दिनो मे 1000 टेस्ट रन बनाये थे.

माइकल हसी का निक नेम हस है परंतु उनके क्रिकेट ज्ञान के कारण उन्हे मिस्टर क्रिकेटर कहा जाता है.माइकल हसी ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट मे आने से पहले साईंस टीचर बनने के लिये काफी पढाई की थी. 

श्रीलंका के खिलाफ हुई सिरीज मे 3 जनवरी 2013 को शुरु हुये अंतिम टेस्ट मैच के बाद उन्होने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास ले लिया है.

185 एकदिवसीय मैचो मे उन्होने 48.15 की औसत से 5442 रन बनाये है.जिसमे 3 शतक और 39 अर्धशतक बनाये है.


उन्होने 79 टेस्ट मैचो मे मे 51.52 की औसत से 6235 रन बनाये है. जिसमे 19 शतक और 29 अर्धशतक शामिल है.
माइकल हसी को हमेशा उनके शानदार खेल और फिल्डिंग के लिये जाना जायेगा. साथ ही एक ऐसे खिलाडी के तौर पर भी जो आस्ट्रेलिया की ओर से खेला परंतु फिर भी किसी भी तरह के विवादो मे नही फसा था.

Tuesday, December 25, 2012

अब बस सफेद जर्सी मे दिखेंगे

तेंडुलकर ने क्रिकेट को भारत मे एक धर्म बना दिया और भारत की जनता ने उन्हे इस खेल का भगवान बना दिया है.कई सालो तक भारत मे लोग अपने टी.वी बंद कर देते थे जब सचिन आऊट हो जाते थे.





अपने पहले दो एकदिवसीय मैच मे उनके बल्ले से कोई रन नही निकला पर फिर भी उन्होने हार नही मानी.न्यूजीलैंड के खिलाफ एकदिवसीय मैच मे जब पहली बार पारी की शुरुवात करने का मौका मिला तो उन्होने उस मौके का भरपूर लाभ उठाया और सिर्फ 49 गेंदो पर शानदार 82 रन बना डाले. एकदिवसीय क्रिकेट मे अपना पहला शतक उन्होने 79 मैचो के बाद बनाया. परंतु उस शतक के पहले ही उनमे एक महान बल्लेबाज़ की छवि उनमे नज़र आने लगी थी.

सचिन रमेश तेंडुलकर जी हा यही नाम है उस महान बल्लेबाज़ का
. अपने 23 साल के एकदिवसीय क्रिकेट के  करियर मे सचिन ने बल्लेबाज़ का हर रिकार्ड अपने नाम किया है.सबसे ज्यादा शतक हो ,सबसे ज्यादा रन या सबसे ज्यादा मैच हर जगह सचिन का ही नाम है. सचिन का खेलने का अंदाज़ बेखौफ है. जब सचिन ने एकदिवसीय मैचो मे बल्लेबाज़ शुरु की तो उन्होने एक नये अंदाज़ मे खेलने का तरीका दिखाया .तकनीक के जरीये किस तरह से तेजी से रन बनाये जा सकते है.

सचिन तेंडुलकर पर हमेशा आरोप लगता रहा है के जब कभी वो शतक बनाते है टीम हार जाती है. लेकिन शायद ऐसा कहने वाले और उनकी बातो पर विश्वास करने वालो ने कभी आकडो पर गौर नही करा है. सचिन के 49 शतक मे से 33 शतक भारत की जीत मे शामिल थे.
अपने पहले ही दौरे पर एक शो मैच मे जब सचिन ने मुश्ताक अहमद की गेंद पर छ्क्के जडे.तो पाकिस्तान के अब तक के उम्मदा लेग स्पिनर अब्दुल कादिर ने कहा –“ बच्चो को क्या छ्क्के मार रहे हो, हमारी गेंद पर मार के बताओ”. सचिन ने कादिर के अगले ही ओवर मे 4 छ्क्के जड दिये.सचिन ने छ्क्के जडने के पहले ना बाद मे कादिर को कुछ कहा. बस अपने बल्ले से जवाब देते रहे. ये सचिन की एक शानदार खूबी है. वो कभी भी शब्दो से नही अपने बल्ले से प्रहार करते है. सचिन ने उस मैच मे सिर्फ 18 गेंद पर 53 रन बनाये थे और वो मैच सिर्फ 20 ओवर का था. अगर वो एक अंतरराष्ट्रिय मैच होता तो ये पारी रिकार्ड के पन्नो मे स्वर्णिम अक्षरो मे लिखी जाती.

सचिन ने दुनिया के हर गेंदबाज़ का सामना किया, किसी ने उन्हे अपनी गती से, किसी ने स्पिन से तो किसी ने उन्हे उकसा के आऊट करने की कोशिश की, लेकिन मास्टर बलास्टर ने सबको चित कर दिया.अपने करियर मे सचिन को सिर्फ आस्ट्रेलिया के ग्लैन मैग्राथ की गेंदबाजी खेलने मे परेशानी आयी और ये उन्होने खुद एक बार कहा था.शेन वार्न के तो वो सपने आने लगे थे.
शारजाह मे लगाये वो 2 शतक आज भी हर क्रिकेट प्रेमी के जेहन मे है.
अकेले दम पर सचिन ने भारत को फाईनल मे पहुचाया और फिर फाईनल मे फिर से शतक लगाकर भारत को कप जीता दिया.
सचिन ना सिर्फ बल्लेबाजी मे बल्कि गेंदबाजी और क्षेत्ररक्ष्ण मे उम्मदा प्रदर्शन करते है. आज भी कोई भी बल्लेबाज़ चाहे वो युवा क्यो ना हो सचिन के थ्रो पर अतिरिक्त रन नही लेता है. गेंद्बाजी मे वो स्विंग भी कराते है तो कभी लेग स्पिन और कभी आफ स्पिन भी करवा देते है. कटक मे आस्ट्रेलिया के खिलाफ़ उन्होने 5 विकेट भी लिये थे और मैच को आस्ट्रेलिया की पकड से छिन लिया था.

सचिन एक महान बल्लेबाज है, पूरी दुनिया ऐसा मानती है. कुछ लोग कहते थे के सचिन उम्मदा बल्लेबाज़ है पर महान नही.
लेकिन उन लोगो के शक को “सर डान ब्रैडमेन “
अपनी पत्नी से कहा था “ये लडका तो मेरे जैसा खेलता है”.

सचिन का एक सपना था.भारतीय टीम को विश्व कप जीताना और 2 अप्रैल 2011 को उनका ये सपना भी पूरा हो गया.सचिन की आंखो मे उस दिन खुशी के आसू थे.
सचिन ने बडे ही सादगी भरे अंदाज़ मे एकदिवसीय क्रिकेट से सन्यास लिया है. सबका कहना है के अगर सचिन एक मैच पहले बता देते तो उन्हे मैदान मे सम्मान के साथ विदा करते. परंतु सचिन को ये सब का मोह नही है. वो तो बस क्रिकेट से प्यार करते है और अभी ये प्यार सिर्फ एकदिवसीय क्रिकेट से कम हुआ है. टेस्ट मे सफेद जर्सी मे भारत का ये शेर अभी भी जवान है.


Sunday, December 23, 2012

आक्रामकता,उत्साह और आलोचनाओ का संगम : रिकी पोंटिंग

क्रिकेट के खेल मे नबंर तीन पर बल्लेबाजी करना हमेशा चुनौतिपूर्ण रहता है। चाहे टेस्ट हो,एकदिवसीय हो या आजकल सबसे ज्यादा मशहूर होता टी-20। अगर आप क्रिकेट के इतिहास को देखे तो पायेंगे के नबंर तीन पर खेलने वाले बल्लेबाजो ने अपने टीम के लिये हमेशा अहम योगदान दिया है। कभी नबंर तीन के बल्लेबाज को शुरुवाती ओवर्स मे ही मैदान पर बल्लेबाज़ी करने आना होता है। तो कभी शुरुवाती बल्लेबाजो द्वारा दी गई अच्छी शुरुवात को आगे बढाने मे मदद करना होता है। जब भी नबंर तीन बल्लेबाज पिच पर आता है,तो उसके लिये हर बार अलग-अलग परिस्थिती होती है।
अपने करियर मे अधिकतर नबंर तीन पर खेलने वाले कुछ बल्लेबाजो ने तो क्रिकेट के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिख दिया है। अपनी टीम को मुश्किल परिस्थिती से निकालने मे उनका योगदान हमेशा रहा है। दुनिया के सबसे महान बल्लेबाज़ सर डान ब्रेडमैनभी नबंर तीन पर खेला करते थे। उन्होने अपने करियर मे खेले 52 टेस्ट मे से 40 टेस्ट मैच मे नबंर तीन पर बल्लेबाजी की है। जिसमे उन्होने 103.63 की औसत से 5078 रन बनाये है।
भारत की ओर से राहुल द्रविड ने हमेशा से नबंर तीन पर शानदार पारीया खेली है। जब भी भारत को नबंर तीन पर एक ठोस पारी की जरुरत होती थी, द्रविड पिच पर दीवार की तरह जम जाते थे। जब भी पहला विकेट जल्दी गिर जाता है, तो नबंर तीन के बल्लेबाज़ से ये उम्मीद की जाती है की वो पिच पर रुककर खेले और कुछ देर रक्षात्मक स्ट्रोक खेले, अधिकतर बल्लेबाज़ इसी प्रथा को मानते है। 
  परंतु 15 फरवरी 1995 को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट एक ऐसा बल्लेबाज़ आया जिसमे इस प्रथा को बदलने की क्षमता थी। अपने पहले एकदिवसीय मुकाबले मे उसने सिर्फ 1 रन बनाया था।  परंतु अपने पहले ही टेस्ट मे शानदार 96 रन की पारी खेलकर आने वाले एक सुनहरे कल का आगाज़ कर दिया था।
आस्ट्रेलिया के इस बल्लेबाज़ ने बल्लेबाज़ी को एक नये आयाम दिये और दुनिया इन्हे पंटर के नाम से जानती है।

रिकी थामस पोंटिंग,जी हा आस्ट्रेलिया के इस महान बल्लेबाज़ ने नबंर तीन पर अपने ही तरीके से बल्लेबाज़ी की और क्रिकेट जगत को नबंर तीन पर खेलने का एक नायाब तरीका सिखाया।
19 दिसबंर 1974 को जन्मे पोंटिंग ने सन 1995 मे साऊथ अफ्रीका के खिलाफ एकदिवसीय मैच से अपना डेब्यू किया और उसी साल श्रीलंका के खिलाफ अपने टेस्ट करियर का आगाज़ भी किया था। आक्रमक अंदाज़ मे खेलने वाले पोंटिंग का शुरुवाती करियर स्थिर नही रहा। सन 1999 से पहले कई बार वो टीम से अंदर बाहर होते रहे। सन 1999 से उन्होने अपनी खोयी हुई लय फिर से प्राप्त की और उसके बाद उन्होने कभी पिछे मुडकर नही देखा।
 सन 2002 मे वो आस्ट्रेलिया की एकदिवसीय टीम के कप्तान बन गये और 2003 मे उन्होने आस्ट्रेलिया की झोली मे तीसरा विश्व कप डाल दिया। उन्होने फाईनल मे भारत के खिलाफ ताबडतोड बल्लेबाज़ी की, उन्होने इस पारी मे 8 बार गेंद को बिना टप्पा खिलाये सीमा रेखा के पार किया और सिर्फ 121 गेंदो पर नाबाद 140 रन बनाकर वर्ल्ड कप 2003 विजेता के रूप मे आस्ट्रेलिया का नाम लिख दिया।
जिस तरह से हर टीम भारत की लम्बी बल्लेबाज़ी लाईन के कारण परेशान होती है। ठीक उसी तरह से दुसरी टीमे आस्ट्रेलिया के ओपनर्स को जल्दी आऊट करने के बाद भी खुश नही होती है, क्योंकी पोंटिंग क्रिज़ पर आते ही सारा दबाव हटा देते थे। 

रिकी पोंटिंग सिर्फ एक आक्रमक बल्लेबाज़ ही नही थे, साथ ही वो आक्रमक कप्तान भी थे। उनकी कप्तानी मे आस्ट्रेलिया ने लगातार दो विश्व कप जीते है। साथ ही वो आस्ट्रेलिया के सबसे सफल कप्तान भी है। कप्तानी और बल्लेबाज़ी के अलावा पोंटिंग एक शानदार क्षेत्ररक्षक भी है। शार्ट लेग और सिली पाईंट पर उन्होने अदभूत कैच पकडे है। स्लिप कैचिंग मे तो वो हमेशा कमाल करते थे। उन्होने टेस्ट क्रिकेट मे 195 कैच और एकदिवसीय क्रिकेट मे 160 कैच पकडे है।

पोंटिंग हमेशा आक्रमक अंदाज़ मे खेलते थे। चाहे फिर वो बल्लेबाज़ी करे, कप्तानी करे या क्ष्रेत्ररक्षण करे। इसी आक्रमक अंदाज़ के चलते उनका विवादो से भी गहरा रिश्ता रहा है। भारत दौरे पर कलकत्ता(अब कोलकाता ) के बार मे महिलाओ को छेडने का विवाद हो, सिडनी टेस्ट मे भारत की दुसरी पारी मे गांगुली का आऊट का निर्णय देने की बात हो या उसी टेस्ट मे जमीन पर गेंद लगने के बाद भी आऊट की अपील करना हो। पोंटिंग किसी भी तरह जीतने मे विश्वास रखते थे। चाहे फिर इसके लिये उन्हे बेईमानी ही क्यो ना करनी पडे।

आस्ट्रेलिया की एक कम्पनी कोकाबुरा कहुना स्पोर्ट्सने बल्लो की साईड मे लकडी की जगह ग्रेफाईट का प्रयोग किया था। इस बल्ले का प्रयोग पोंटिंग के साथ जयसूर्या,जस्टिन लैगर और नथल एस्टल भी करते थे। पोंटिंग ने सन 2004 के अंत से इस बल्ले का उपयोग शुरु किया था और 12 महीने मे उन्होने इस बल्ले से खेलते हुये 67.13 की औसत से टेस्ट मे 1544 रन और एकदिवसीय क्रिकेट मे 1137 बनाये थे। सन 2006 की शुरुवात मे अपने 100वे टेस्ट की दोनो पारीयो मे शतक लगा कर एक रिकार्ड भी बनाया था। इस दौरान वो टेस्ट मे नबंर 1 और एकदिवसीय क्रिकेट मे नबंर 2 की उपाधि भी प्राप्त कर चुके थे। फरवरी 2006 से आई.सी.सी ने इस बल्ले के प्रयोग पर रोक लगा दी है।

अपने पहले भारत दौरे पर पोंटिंग कलकत्ता के ईक्यूनोक्स नाईट क्लब मे महिलाओ को छेडने का आरोप भी लगा था। इसके कारण पोंटिंग पर $1000 डालर का जुर्माना भी लगा था। बाद मे पोंटिंग ने माफी भी मांगी थी परंतु छेडछाड की बात से वो मुकर गये थे। पोंटिंग जब खेलते थे तो विपक्षी खिलाडियो से भी भिड जाते थे। उन्होने साईमंड्स को टेस्ट टीम मे लाने की भी वकालत की थी। बाद मे साईमंडस को अपने खराब व्यवहार के कारण टीम से निकाल दिया गया था।

भारत के खिलाफ मे सिडनी टेस्ट मे भी उनका व्यवहार खराब रहा था।  जिसके चलते उनकी काफी आलोचना भी हुई थी।  पोंटिंग ने उस मैच मे भी हरभजन साईमंड्स विवाद मे साईमंड्स का साथ दिया था। गांगुली के आऊट होने पर अपांयर मार्क बेंसन को उन्होने आऊट का इशारा किया था।  अपंयार ने भी उनकी बात मानते हुये गांगुली को आऊट दे दिया, परंतु बाद मे टी.वी रिपले मे साफ दिख रहा था के गेंद जमीन को छू गई थी।
छोटे कद के पोंटिंग का फुटवर्क काफी शानदार था। फ्रंट फुट पर आकर वो बहुत ही शानदार ड्राईव करते थे। जब गेंदबाज़ शार्ट गेंद फेकते है और बल्लेबाज़ फ्रंट फुट पर हो तो उस वक़्त बल्लेबाज़ के लिये शाट खेलने मे मुश्किल होती है। परंतु पोंटिंग फ्रंट फुट से भी पुल मार देते थे। हरभजन सिह के अलावा उन्हे दुनिया मे किसी भी गेंदबाज़ ने ज्यादा परेशान नही किया, ये बात उन्होने खुद संयास के बाद कही है।

साऊथ अफ्रिका के खिलाफ पर्थ मे हुये सिरीज के आखिरी टेस्ट के बाद पोंटिंग ने अपने क्रिकेट करियर को अंत करने का फैसला किया ,अंतरराष्ट्रिय क्रिकेट मे ये उनका आखरी मैच था। इस मैच मे वो कुछ कमाल नही कर पाये। पर्थ से उन्होने अपने टेस्ट करियर का आगाज़ किया था और उन्होने इसी मैदान पर अपने इस सफर का अंत भी कर दिया है। 
पोंटिंग ने 168 टेस्ट मैच मे 51.85 की औसत से 13378 रन बनाये है। जिसमे 41 शतक और 62 अर्धशतक शामिल है। उनका सर्वोच स्कोर 257 रन का रहा है। एकदिवसीय क्रिकेट मे उन्होने 375 मैच मे 42.03 की औसत से 13704 रन बनाये है। जिसमे 30 शतक और 82 अर्धशतक शामिल है। उनका सर्वोच 164 रन का स्कोर रहा है।

पोंटिंग ने 2008 मे आई.पी.एल मे कोलकाता नाईट राईडर्स की टीम से शिरकत की थी। परंतु उन्हे आई.पी.एल से ज्यादा अहमियत अपने देश के लिये क्रिकेट खेलने को दी थी। 
पोंटिंग को हमेशा खेलभावना का उलंघन करने के कारण आलोचनाओ का सामना करना पडा। खासकर भारत के दर्शको ने उन्हे सिडनी टेस्ट विवाद के बाद एक विलेन की तरह ही देखा है। परन्तु युवा खिलाडीयो को उनसे सिखना चाहिये के वो किस तरह से कप्तानी,बल्लेबाजी और फिल्डिंग करते थे और तीनो क्षेत्र मे हमेशा लाजवाब रहे थे। पोंटिंग़ ने हमेशा सचिन तेंडुलकर को कडी प्रतिस्पर्धा दी, परंतु उन्होने खुद संयास के बाद कहा के सचिन दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज़ है। मैं हमेशा दुसरे नबंर पर रहे है।

पोंटिंग एक अच्छे खिलाडी नही है,परंतु वो एक बेहतरीन बल्लेबाज है।
(चिराग जोशी)